उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये

12 January 1863 to 04 July 1902

 जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है !

 

Posted on January 12, 2012, in All categorized, स्वामी विवेकानन्द. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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